Osho Bestsellers In Hindi|Osho Books in Hindi|Spritual Books|Meditation Books|- Dhyan Sutra + Jeevan Jine Ki Kala (Set of 2 Books)
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About The Book

ध्यान सूत्र-: महाबलेश्वर के प्राकृतिक वातावरण में ओशो द्वारा संचालित ध्यान शिविर के दौरान हुए प्रवचनों व प्रायोगिक ध्यान प्रयोगों का संकलन है यह पुस्तक। शरीर विचारों और भावों की एक-एक परत से ग्रंथियों को विलीन करने की कला समझते हुए ओशो हमें समग्र स्वास्थ्य और संतुलन की ओर लिए चलते हैं।पुस्तक के कुछ अन्य विषय-बिन्दुः• सेक्स उर्जा का सृजनात्मक उपयोग कैसे करें?• क्रोध् क्या है? क्या है उसकी शक्ति?• अहंकार को किस शक्ति में बदलें?• वैज्ञानिक युग में अध्यात्म का क्या स्थान है?जीवन जीने की कला-: जीवन की कला से मेरा यही प्रयोजन है कि हमारी संवेदनशीलता हमारी पात्रता हमारी ग्राहकता हमारी रिसेप्टिविटी इतनी विकसित हो कि जीवन में जो सुंदर है जीवन में जो सत्य है जीवन में जो शिव है वह सब - वह सब हमारे हृदय तक पहुंच सके। उस सबको हम अनुभव कर सकें लेकिन हम जीवन के साथ जो व्यवहार करते हैं उससे हमारे हृदय का दर्पण न तो निखरता न निर्मल होता न साफ होता; और गंदा होता और धूल से भर जाता है । उसमें प्रतिबिंब पड़ने और भी कठिन हो जाते हैं। जिस भांति जीवन को हम बनाए हैं- सारी शिक्षा सारी संस्कृति सारा समाज मनुष्य के व्यक्तित्व को ठीक दिशा में नहीं ले जाता है। बचपन से ही गलत दिशा शुरू हो जाती है और वह गलत दिशा जीवन भर जीवन से ही परिचित होने में बाधा डालती रहती है। पहली बात जीवन को अनुभव करने के लिए एक प्रामाणिक चित्त एक शुद्ध दिमाग चाहिए। हमारा सारा चित्त औपचारिक है फार्मल है प्रामाणिक नहीं है। न तो प्रामाणिक रूप से कभी प्रेम न कभी क्रोध न प्रामाणिक रूप से कभी हमने घृणा की है न प्रामाणिक रूप से हमने कभी क्षमा की है।हमारे सारे चित्त के आवर्तन हमारे सारे चित्त के रूप औपचारिक हैं झूठे हैं मिथ्या हैं। अब मिथ्या चित्त को लेकर जीवन के सत्य को कोई कैसे जान सकता है? सत्य चित्त को लेकर ही जीवन के सत्य से संबंधित हुआ जा सकता है। हमारा पूरा दिमाग हमारा पूरा चित्त हमारा पूरा मन मिथ्या और औपचारिक है। इसे समझ लेना उपयोगी है।सुबह ही आप अपने घर के बाहर आ गए हैं और कोई राह पर दिखाई पड़ गया है और आप नमस्कार कर चके हैं। और आप कहते हैं कि उससे मिलके बड़ी खुशी हुई आपके दर्शन हो गए लेकिन मन में आप सोचते हैं कि इस दुष्ट का सुबह ही सुबह चेहरा कहां से दिखाई पड़ गया । यह अशुद्ध दिमाग है यह गैर- प्रामाणिक मन की शुरुआत हुई। चौबीस घंटे हम ऐसे दोहरे ढंग से जीते हैं तो जीवन से कैसे संबंध होगा? बंधन पैदा होता है दोहरेपन से । जीवन में कोई बंधन नहीं है।
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